तू अपनी आशियाना छोड़

तू अपनी आशियाना छोड़
उड़ पड़ी और बस्तीमे,
मन भरा तो लौट आई
पर तू इतनी मूर्ख भला कैसी??

लो मनमे पत्थर रख
माफ किया तेरी ख्वाबोंकी गुस्ताखीकॊ,
पर एक दिन तू लौट आई
और सब कुछ तुझे वैसा ही मिले जैसे तू गई थी छोड़
तेरी इस सोच से कैसे दंग न रहू ए पंछी में भला?

© Selina Subba


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